वी लोस्ट अवर हिन्दी ज़्यादा सही होगा यह कहने की बजाए कि हम हिंदी खो रहे हैं, या यूं कहें कि हिंदी हमसे दूर होती जा रही है। मतलब साफ है कि अंग्रेजी के सामने हिंदी की स्थिति थोड़ी चरमरा सी गई है। धीरे-धीरे हम हिंदी का प्रयोग आम बोलचाल की भाषा में भी कम करते जा रहे हैं और अंग्रेजी को ज़्यादा महत्व दे रहे हैं।
हमारी मनोस्थिति यह बन गई है कि आज समाज के हर तबके का इंसान अपने बच्चों की शिक्षा का हिंदी माध्यम की बजाए अंग्रेजी माध्यम में कराने की सोचता है। तभी वह सफल हो पाएगा। हालात यह है कि अब अंग्रेजी शासन, प्रशासन के कामकाज की भाषा बन गई है। हिंदी का तो मात्र अनुवाद के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। ऐसे में वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर ने अपने एक लेख में सही कहा है कि काफी समय तक यह कहा जाता रहा कि भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी है पर सच कुछ और ही है और वह यह है कि भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी है। संविधान की किताब में तो लिखा है कि हिंदी केंद्रीय सरकार के कामकाज की और स्थानीय क्षेत्रीय भाषाएं राज्य सरकारों के कामकाज भाषा होगी, पर रोना तो इस बात का है कि केंद्र सरकार का सारा काम अंग्रेजी में ही होता है। हिंदी का प्रयोग तो केवल अनुवाद मात्र के लिए ही किया जा रहा है। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि हिंदी केवल नाम की ही राष्ट्रभाषा है। जहां छोटे-से-छोटे काम को करने के लिए अंग्रेजी का प्रयोग किया जाता हो तो वहां हिंदी की स्थिति क्या होगी? इस पर आसानी से विचार किया जा सकता है।
अब देश को आजाद हुए तिरसठ साल हो गए हैं पर हिंदी की कोई खास पहचान नहीं बनी है साख बनी है तो अंग्रेजी की। अंग्रेजी शिक्षा, बाजार, प्रशासन, लोकाचार की भाषा बनती जा रही है तथा तमाम क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करती जा रही है जैसे यह हमारी आम बोलचाल की भाषा हो।
देश में हिंदी की उपेक्षा कुछ इस तरह से की भी की जा रही है कि शहरों के कुछ विख्यात विद्यालयों में दाखिला लेने के लिए विद्यालय प्रशासन बच्चों के अभिभावकों से पहले ही सुनिश्चित कर लेते हैं कि बच्चों को अंग्रेजी आती भी है या नहीं? कुछ विद्यालयों में तो नियम कायदे इतने कड़े हैं कि परिसर में हिंदी बोलने पर जुर्माना लगा रखा है। भाषा के साथ इस तरह की सौदेबाजी की जा रही, जैसे बाजार में किसी वस्तु को खरीदने के लिए किया जाता हो। सब जगह अंग्रेजी का ही बोलबाला हो रहा है तो क्या यह अघोषित तौर पर हमारी राष्ट्रभाषा बन गई है?
तमाम क्षेत्रों में अंग्रेजी की बहुलता को देखते हुए हमारे चौथे स्तंभ ;मीड़िया में भी अंग्रेजीबाजी जोर पकड़ने लगी है। हमारे हिंदी दैनिक पत्रों की स्थिति यह है कि शायद ऐसी कोई ही ख़बर हो जिसमें अंगेजी का पुट न मिले। ख़बरों के शीर्षक तक में अंग्रेजी शब्द लगने लगे हैं और यही आज सभी पत्रों की नीति बन गई है। ऐसा ही कुछ हमारे फिल्म जगत में हो रहा है। पिछले कई दशकों की फिल्मों की बात की जाए तो उस समय की फिल्मों में अंग्रेजी को इतनी प्रथमिकता नहीं दी जाती थी जितना की अब देखनें को मिल रहा है। अब फिल्मों में हिंदी, अंग्रेजी का अनुपात 55-50 का हो चला है। ऐसे मेें एक झोपड़ पटट्ी में रहने वाले इंसान को भला क्या समझ में आएगा?
धीरे-धीरे हिंदी की प्राथमिकता कम सी होने लगी है। चौतरपफा अंग्रेजी ही काबिज़ होती जा रही है। हिंदी को छोड़ अंग्रेजी की तरफ हम लोगों की भागमभाग इस बात का संकेत है कि ंिहंदी ने हमें वो सब कुछ नहीं दिया जो अंग्रेजी हमें दे रही है पर ऐसा कहना कुछ सही नहीं लगता। हिंदी हमारी अपनी भाषा है हमारा उसके साथ एक अटूट लगाव है पर लोगों का अंग्रेजी के प्रति बढ़ते चलन को देखते हुए बस यही अंदेशा जताया जा सकता है कि हम लोगों के लिए आाज शायद अंग्रेजी ही सबकुछ है। हिंदी की यह मनोदशा देखकर यही कहा जा सकता है कि हम इससे अलग से होते जा रहे हैं, कटते से नज़र आ रहे हैं और अंग्रेजी अपने में आत्मसात करते जा रहे हैं। अब सबकी सोच एक हो चली है कि हमारी भाषा में वो क्रांति नहीं है जो अंग्रेजी में है और जो लोगों का विकास स्तर बढ़ा जा रही है। अंत में बस यही कहा जा सकता हमारी अपनी भाषा अंग्रेजी से पिछड़ती जा रही और हम उभरते जा रहे हैं।
हमारी मनोस्थिति यह बन गई है कि आज समाज के हर तबके का इंसान अपने बच्चों की शिक्षा का हिंदी माध्यम की बजाए अंग्रेजी माध्यम में कराने की सोचता है। तभी वह सफल हो पाएगा। हालात यह है कि अब अंग्रेजी शासन, प्रशासन के कामकाज की भाषा बन गई है। हिंदी का तो मात्र अनुवाद के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। ऐसे में वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर ने अपने एक लेख में सही कहा है कि काफी समय तक यह कहा जाता रहा कि भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी है पर सच कुछ और ही है और वह यह है कि भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी है। संविधान की किताब में तो लिखा है कि हिंदी केंद्रीय सरकार के कामकाज की और स्थानीय क्षेत्रीय भाषाएं राज्य सरकारों के कामकाज भाषा होगी, पर रोना तो इस बात का है कि केंद्र सरकार का सारा काम अंग्रेजी में ही होता है। हिंदी का प्रयोग तो केवल अनुवाद मात्र के लिए ही किया जा रहा है। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि हिंदी केवल नाम की ही राष्ट्रभाषा है। जहां छोटे-से-छोटे काम को करने के लिए अंग्रेजी का प्रयोग किया जाता हो तो वहां हिंदी की स्थिति क्या होगी? इस पर आसानी से विचार किया जा सकता है।
अब देश को आजाद हुए तिरसठ साल हो गए हैं पर हिंदी की कोई खास पहचान नहीं बनी है साख बनी है तो अंग्रेजी की। अंग्रेजी शिक्षा, बाजार, प्रशासन, लोकाचार की भाषा बनती जा रही है तथा तमाम क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करती जा रही है जैसे यह हमारी आम बोलचाल की भाषा हो।
देश में हिंदी की उपेक्षा कुछ इस तरह से की भी की जा रही है कि शहरों के कुछ विख्यात विद्यालयों में दाखिला लेने के लिए विद्यालय प्रशासन बच्चों के अभिभावकों से पहले ही सुनिश्चित कर लेते हैं कि बच्चों को अंग्रेजी आती भी है या नहीं? कुछ विद्यालयों में तो नियम कायदे इतने कड़े हैं कि परिसर में हिंदी बोलने पर जुर्माना लगा रखा है। भाषा के साथ इस तरह की सौदेबाजी की जा रही, जैसे बाजार में किसी वस्तु को खरीदने के लिए किया जाता हो। सब जगह अंग्रेजी का ही बोलबाला हो रहा है तो क्या यह अघोषित तौर पर हमारी राष्ट्रभाषा बन गई है?
तमाम क्षेत्रों में अंग्रेजी की बहुलता को देखते हुए हमारे चौथे स्तंभ ;मीड़िया में भी अंग्रेजीबाजी जोर पकड़ने लगी है। हमारे हिंदी दैनिक पत्रों की स्थिति यह है कि शायद ऐसी कोई ही ख़बर हो जिसमें अंगेजी का पुट न मिले। ख़बरों के शीर्षक तक में अंग्रेजी शब्द लगने लगे हैं और यही आज सभी पत्रों की नीति बन गई है। ऐसा ही कुछ हमारे फिल्म जगत में हो रहा है। पिछले कई दशकों की फिल्मों की बात की जाए तो उस समय की फिल्मों में अंग्रेजी को इतनी प्रथमिकता नहीं दी जाती थी जितना की अब देखनें को मिल रहा है। अब फिल्मों में हिंदी, अंग्रेजी का अनुपात 55-50 का हो चला है। ऐसे मेें एक झोपड़ पटट्ी में रहने वाले इंसान को भला क्या समझ में आएगा?
धीरे-धीरे हिंदी की प्राथमिकता कम सी होने लगी है। चौतरपफा अंग्रेजी ही काबिज़ होती जा रही है। हिंदी को छोड़ अंग्रेजी की तरफ हम लोगों की भागमभाग इस बात का संकेत है कि ंिहंदी ने हमें वो सब कुछ नहीं दिया जो अंग्रेजी हमें दे रही है पर ऐसा कहना कुछ सही नहीं लगता। हिंदी हमारी अपनी भाषा है हमारा उसके साथ एक अटूट लगाव है पर लोगों का अंग्रेजी के प्रति बढ़ते चलन को देखते हुए बस यही अंदेशा जताया जा सकता है कि हम लोगों के लिए आाज शायद अंग्रेजी ही सबकुछ है। हिंदी की यह मनोदशा देखकर यही कहा जा सकता है कि हम इससे अलग से होते जा रहे हैं, कटते से नज़र आ रहे हैं और अंग्रेजी अपने में आत्मसात करते जा रहे हैं। अब सबकी सोच एक हो चली है कि हमारी भाषा में वो क्रांति नहीं है जो अंग्रेजी में है और जो लोगों का विकास स्तर बढ़ा जा रही है। अंत में बस यही कहा जा सकता हमारी अपनी भाषा अंग्रेजी से पिछड़ती जा रही और हम उभरते जा रहे हैं।
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