Wednesday, April 6, 2011

कैसे बेगा हुए बेधर??

मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के जंगलों में रह रहे बेगा आदिवासी पिछले कुछ समय से अपनी जमीन के लिए संघर्ष कर रहे है। सरकार ने इन लागों की जमीन हड़पकर उस पर बहुमूल्य लकड़ियों के वृक्षों को लगाने का काम कर रही है। इससे सरकार को तो इन्हें बेचकर काफी अच्छा मुनाफा मिल रहा है लेकिन ये आदिवासी लोग बेसहारा हो गए। जमीन ही इनका एकमात्र साधन थी अब वो भी सरकार के पास है।
अब जैसे-तैसे जुगाड़ कर ये अपने बचे-कुचे दिन काट रहे हैं। इनके भी कुछ सपने हैं,कुछ महत्वकांक्षा हैं, और जीने के तरीके, शायद हम लागों से कुछ अलग। इनके लिए जंगल ही सबकुछ है। यही इनकी शुरूआत है और अंत भी। मतलब साफ है कि इनकी जिंदगी जंगलों तक ही सीमित है, बाहरी दुनिया से इनका कोई सरोकार नहीं है। अब सवाल यह उठता है कि जब ये आदिवासी शुरू से ही इस सीमित दुनिया में रहते आ रहें हैं तो सरकार को इनकी जिंदगी में दखलअंदाजी की जरुरत क्यों आन पड़ी?
दरअसल बेगा एक आदिवासी जनजाति है जो शुरू से ही जंगलों में अपना जीवनयापन करती आ रही है। इनका रहन-सहन, घूमना-फिरना सब कुछ इन जंगलों तक ही सीमित है। यह एक सीमांत जिंदगी जी रहे हैं। इनके मायने में जिंदगी इन झाड-फूस तक ही सीमित है इससे बाहर एक नई दुनिया है जहां इनकी पहुंच ना के बराबर है।  बेगा जंगल के एक छोटे हिस्सें को साफ कर, उस पर खेती कर अपने व अपने परिवार को पाल रहे हैं। इन लागों को किसी से कोई लेन देन नहीं है। ये अपनी जिंदगी में खुश थे लेकिन सरकार ने यहां भी अपना डेरा डाल लिया।
अब सरकार ने इन आदिवासियों की जमीन हथियाकर उस पर बहुमूल्य पेड़ उगाने का एक नया काम शुरू कर दिया है। सब नियम कानून सुदूर दिल्ली में बैठी सरकार बनाती है और यहां उन नियमों को अमल में लाया जाता है। इस जमीन से हुई आमदनी का ब्यौरा एक फाइल में बंद होकर दूर प्रदेश में बैठी सरकार तक पंहुचाया जाता है।  इस तरह सरकार नए-नए नियम कानून बनाती है और उन्हें किसी प्रदेश में जाकर थोप देती है। यहां लागू कहने की बजाए थोपना ज्यादा सही होगा क्योंकि किसी नियम को लागू वहां किया जाता है जहां वह लोगों के अनुकूल हो, उनके हित में हो लेकिन यहां सबकुछ सरकार की मनमानी अनुसार हो रहा है। ऐसे में बेगा क्या कर सकते हैं? यह तो केवल एक तरफ खड़े होकर सरकारी तमाशा ही देख सकते थे ये लोग सरकार के खिलाफ कोई आवाज़ भी नहीं उठा सकते क्योंकि इनमे इतना साहस नहीं है कि सरकार के सामने अंगुली भी़ उठा सके।
ऐसे में इनकी सहायता के लिए कुछ सामाजिक संस्था सामने आई। इन संस्था के साथ मिलकर इन लोगों ने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार के खिलाफ एक मुहिम शुरू की। संस्था का साथ मिलने पर इन लोगों ने सरकार के खिलाफ अपना रोष व्यक्त किया। बहुत ही जल्द यह अभियान एक आंदोलन में और फिर एक जन आंदोलन में बदल गया। जैसे-जैसे ये लोग संस्था के साथ जुड़ते गए वैसे-वैसे सरकार के खिलाफ इनका जनआंदोलन तेज होता गया। यह जनआंदोलन तब अपनी चरमसीमा पर पहुंच गया जब वर्ष 2007 में कुछ सामाजिक संस्था के लागों के साथ 25 हजार लोग जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के लिए मध्यप्रदेश से दिल्ली तक पैदल चलकर अपने हक के लिए सामने आए।
तो सरकार ने भी कुछ वादों के साथ इन्हें तुरंत चलता कर दिया और ये यह सोचकर खुशी-खुशी वापस आ गए कि सरकार ने इनकी बुलंद आवाज़ के सामने अपने घुटने टेक दिए।
सराकर इनकी जमीन को इन्हें पट्टे पर देकर इनसे काम करा रही है।

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