Saturday, April 23, 2011

पिछड़ती हिंदी उभरते हम...

वी लोस्ट अवर हिन्दी ज़्यादा सही होगा यह कहने की बजाए कि हम हिंदी खो रहे हैं, या यूं कहें कि हिंदी हमसे दूर होती जा रही है। मतलब साफ है कि अंग्रेजी के सामने हिंदी की स्थिति थोड़ी चरमरा सी गई है। धीरे-धीरे हम हिंदी का प्रयोग आम बोलचाल की भाषा में भी कम करते जा रहे हैं और अंग्रेजी को ज़्यादा महत्व दे रहे हैं।
हमारी मनोस्थिति यह बन गई है कि आज समाज के हर तबके का इंसान अपने बच्चों की शिक्षा का हिंदी माध्यम की बजाए अंग्रेजी माध्यम में कराने की सोचता है। तभी वह सफल हो पाएगा। हालात यह है कि अब अंग्रेजी शासन, प्रशासन के कामकाज की भाषा बन गई है। हिंदी का तो मात्र अनुवाद के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। ऐसे में वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर ने अपने एक लेख में सही कहा है कि काफी समय तक यह कहा जाता रहा कि भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी है पर सच कुछ और ही है और वह यह है कि भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी है। संविधान की किताब में तो लिखा है कि हिंदी केंद्रीय सरकार के कामकाज की और स्थानीय क्षेत्रीय भाषाएं राज्य सरकारों के कामकाज भाषा होगी, पर रोना तो इस बात का है कि केंद्र सरकार का सारा काम अंग्रेजी में ही होता है। हिंदी का प्रयोग तो केवल अनुवाद मात्र के लिए ही किया जा रहा है। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि हिंदी केवल नाम की ही राष्ट्रभाषा है। जहां छोटे-से-छोटे काम को करने के लिए अंग्रेजी का प्रयोग किया जाता हो तो वहां हिंदी की स्थिति क्या होगी? इस पर आसानी से विचार किया जा सकता है।
 अब देश को आजाद हुए तिरसठ साल हो गए हैं पर हिंदी की कोई खास पहचान नहीं बनी है साख बनी है तो अंग्रेजी की। अंग्रेजी शिक्षा, बाजार, प्रशासन, लोकाचार की भाषा बनती जा रही है तथा तमाम क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करती जा रही है जैसे यह हमारी आम बोलचाल की भाषा हो।
देश में हिंदी की उपेक्षा कुछ इस तरह से की भी की जा रही है कि शहरों के कुछ विख्यात विद्यालयों में दाखिला लेने के लिए विद्यालय प्रशासन बच्चों के अभिभावकों से पहले ही सुनिश्चित कर लेते हैं कि बच्चों को अंग्रेजी आती भी है या नहीं? कुछ विद्यालयों में तो नियम कायदे इतने कड़े हैं कि परिसर में हिंदी बोलने पर जुर्माना लगा रखा है। भाषा के साथ इस तरह की सौदेबाजी की जा रही, जैसे बाजार में किसी वस्तु को खरीदने के लिए किया जाता हो। सब जगह अंग्रेजी का ही बोलबाला हो रहा है तो क्या यह अघोषित तौर पर हमारी राष्ट्रभाषा बन गई है?
तमाम क्षेत्रों में अंग्रेजी की बहुलता को देखते हुए हमारे चौथे स्तंभ ;मीड़िया में भी अंग्रेजीबाजी जोर पकड़ने लगी है। हमारे हिंदी दैनिक पत्रों की स्थिति यह है कि शायद ऐसी कोई ही ख़बर हो जिसमें अंगेजी का पुट न मिले। ख़बरों के शीर्षक तक में अंग्रेजी शब्द लगने लगे हैं और यही आज सभी पत्रों की नीति बन गई है। ऐसा ही कुछ हमारे फिल्म जगत में हो रहा है। पिछले कई दशकों की फिल्मों की बात की जाए तो उस समय की फिल्मों में अंग्रेजी को इतनी प्रथमिकता नहीं दी जाती थी जितना की अब देखनें को मिल रहा है। अब फिल्मों में हिंदी, अंग्रेजी का अनुपात 55-50 का हो चला है। ऐसे मेें एक झोपड़ पटट्ी में रहने वाले इंसान को भला क्या समझ में आएगा? 
धीरे-धीरे हिंदी की प्राथमिकता कम सी होने लगी है। चौतरपफा अंग्रेजी ही काबिज़ होती जा रही है। हिंदी को छोड़ अंग्रेजी की तरफ हम लोगों की भागमभाग इस बात का संकेत है कि ंिहंदी ने हमें वो सब कुछ नहीं दिया जो अंग्रेजी हमें दे रही है पर ऐसा कहना कुछ सही नहीं लगता। हिंदी हमारी अपनी भाषा है हमारा उसके साथ एक अटूट लगाव है पर लोगों का अंग्रेजी के प्रति बढ़ते चलन को देखते हुए बस यही अंदेशा जताया जा सकता है कि हम लोगों के लिए आाज शायद अंग्रेजी ही सबकुछ है। हिंदी की यह मनोदशा देखकर यही कहा जा सकता है कि हम इससे अलग से होते जा रहे हैं, कटते से नज़र आ रहे हैं और अंग्रेजी अपने में आत्मसात करते जा रहे हैं। अब सबकी सोच एक हो चली है कि हमारी भाषा में वो क्रांति नहीं है जो अंग्रेजी में है और जो लोगों का विकास स्तर बढ़ा जा रही है। अंत में बस यही कहा जा सकता हमारी अपनी भाषा अंग्रेजी से पिछड़ती जा रही और हम उभरते जा रहे हैं। 

Monday, April 11, 2011

ख़ामोशी

ख़ामोशी
तेरी ये ख़ामोश आंखे और उनमें दर्द का सैलाब।
तुझ पर बीती बयां कर रही है,
क्या हुआ जो आज तू चुप है
तेरी इस चुप्पी से घर का आंगन तक चुप है
कुछ तो बता इस ख़ामोशी के पीछे वजह क्या है।।
कुछ खोने का ग़म है या किसी के बिछड़ने का दर्द है।
आंखों में झलकता पानी, तेरी ख़ामोशी बता रहा है
कुछ तो बोल कुछ तो बता तू सिमटी सी क्यों है,
ये नम आंखें, ये ख़ामोशी, और ये सिमटापन तुझसे तेरी हँसी ले गए
कुछ तो बता इस ख़ामोशी के पीछे वजह क्या है।।
रातभर तेरा दीवार से सटकर गुमसुम बैठना।
शायद किसी से बिछड़ने की याद दिला रहा है
पर तेरी ये ख़ामोशी अच्छी नहीं लगती
कब तक तेरी आंखें बहती रहेगा
और तू यूं ही ख़ामोश रहेगी
कुछ तो बता इस ख़ामोशी के पीछे वजह क्या है।।

Friday, April 8, 2011

सादगी


सादगी

मेरा तेरे पास यूं छुप के से आना।
तेरी जुल्फ़ों को तेरे चेहरे से हटाना,
इस बहाने तेरे चेहरे को छूना
और फिर अपने हाथों से मेरे हाथों को हटाना
मुझे आज भी याद है।।
तेरा छोटी-छोटी बातों पर रूठ जाना।
लाख कोशिश करना मनाने की पर तेरा ना मानना
और उस रूठेपन में तेरी मोहब्बत का होना
मुझे आज भी याद है।।
अपनी परेशानियों को मुझसे छुपाना।
और पूछने पर भी हँस कर टाल देना
तेरी कुछ इस तरह की बातें
मुझे आज भी याद है।।
यही कुछ बातें रातभर मुझे सोने नहीं देती।
और तेरी याद, मुझे तुझसे अलग होने नहीं देती।।
तेरी यही सादगी तो मेरे साथ है
और इस सादगी में तेरा चेहरा
मुझे आज भी याद है।।

Wednesday, April 6, 2011

कैसे बेगा हुए बेधर??

मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के जंगलों में रह रहे बेगा आदिवासी पिछले कुछ समय से अपनी जमीन के लिए संघर्ष कर रहे है। सरकार ने इन लागों की जमीन हड़पकर उस पर बहुमूल्य लकड़ियों के वृक्षों को लगाने का काम कर रही है। इससे सरकार को तो इन्हें बेचकर काफी अच्छा मुनाफा मिल रहा है लेकिन ये आदिवासी लोग बेसहारा हो गए। जमीन ही इनका एकमात्र साधन थी अब वो भी सरकार के पास है।
अब जैसे-तैसे जुगाड़ कर ये अपने बचे-कुचे दिन काट रहे हैं। इनके भी कुछ सपने हैं,कुछ महत्वकांक्षा हैं, और जीने के तरीके, शायद हम लागों से कुछ अलग। इनके लिए जंगल ही सबकुछ है। यही इनकी शुरूआत है और अंत भी। मतलब साफ है कि इनकी जिंदगी जंगलों तक ही सीमित है, बाहरी दुनिया से इनका कोई सरोकार नहीं है। अब सवाल यह उठता है कि जब ये आदिवासी शुरू से ही इस सीमित दुनिया में रहते आ रहें हैं तो सरकार को इनकी जिंदगी में दखलअंदाजी की जरुरत क्यों आन पड़ी?
दरअसल बेगा एक आदिवासी जनजाति है जो शुरू से ही जंगलों में अपना जीवनयापन करती आ रही है। इनका रहन-सहन, घूमना-फिरना सब कुछ इन जंगलों तक ही सीमित है। यह एक सीमांत जिंदगी जी रहे हैं। इनके मायने में जिंदगी इन झाड-फूस तक ही सीमित है इससे बाहर एक नई दुनिया है जहां इनकी पहुंच ना के बराबर है।  बेगा जंगल के एक छोटे हिस्सें को साफ कर, उस पर खेती कर अपने व अपने परिवार को पाल रहे हैं। इन लागों को किसी से कोई लेन देन नहीं है। ये अपनी जिंदगी में खुश थे लेकिन सरकार ने यहां भी अपना डेरा डाल लिया।
अब सरकार ने इन आदिवासियों की जमीन हथियाकर उस पर बहुमूल्य पेड़ उगाने का एक नया काम शुरू कर दिया है। सब नियम कानून सुदूर दिल्ली में बैठी सरकार बनाती है और यहां उन नियमों को अमल में लाया जाता है। इस जमीन से हुई आमदनी का ब्यौरा एक फाइल में बंद होकर दूर प्रदेश में बैठी सरकार तक पंहुचाया जाता है।  इस तरह सरकार नए-नए नियम कानून बनाती है और उन्हें किसी प्रदेश में जाकर थोप देती है। यहां लागू कहने की बजाए थोपना ज्यादा सही होगा क्योंकि किसी नियम को लागू वहां किया जाता है जहां वह लोगों के अनुकूल हो, उनके हित में हो लेकिन यहां सबकुछ सरकार की मनमानी अनुसार हो रहा है। ऐसे में बेगा क्या कर सकते हैं? यह तो केवल एक तरफ खड़े होकर सरकारी तमाशा ही देख सकते थे ये लोग सरकार के खिलाफ कोई आवाज़ भी नहीं उठा सकते क्योंकि इनमे इतना साहस नहीं है कि सरकार के सामने अंगुली भी़ उठा सके।
ऐसे में इनकी सहायता के लिए कुछ सामाजिक संस्था सामने आई। इन संस्था के साथ मिलकर इन लोगों ने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार के खिलाफ एक मुहिम शुरू की। संस्था का साथ मिलने पर इन लोगों ने सरकार के खिलाफ अपना रोष व्यक्त किया। बहुत ही जल्द यह अभियान एक आंदोलन में और फिर एक जन आंदोलन में बदल गया। जैसे-जैसे ये लोग संस्था के साथ जुड़ते गए वैसे-वैसे सरकार के खिलाफ इनका जनआंदोलन तेज होता गया। यह जनआंदोलन तब अपनी चरमसीमा पर पहुंच गया जब वर्ष 2007 में कुछ सामाजिक संस्था के लागों के साथ 25 हजार लोग जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के लिए मध्यप्रदेश से दिल्ली तक पैदल चलकर अपने हक के लिए सामने आए।
तो सरकार ने भी कुछ वादों के साथ इन्हें तुरंत चलता कर दिया और ये यह सोचकर खुशी-खुशी वापस आ गए कि सरकार ने इनकी बुलंद आवाज़ के सामने अपने घुटने टेक दिए।
सराकर इनकी जमीन को इन्हें पट्टे पर देकर इनसे काम करा रही है।