Sunday, March 24, 2013

कल पर जीने की राह कठिन...???

यह एक सोचनीय प्रश्न व गंभीर प्रश्न है कि कल हमारा कैसा होगा? जिस तरह से हम अपनी भोगविलासिता के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहे हैं, अपनी असीमित होती आवश्यकता को शान्त करने के साथ-साथ इन्हें क्षति पहुंचा रहे है। इससे तो यही तथ्य बाहर निकलकर सामने आता है कि कल पर आश्रित होने की राह बड़ी जटिल है। प्राकृतिक संसाधनों का हम जिस प्रकार से आंख मूंदकर उपभोग कर रहे हैं। उससे अधिक तीव्र गति से हमें इसके दुष्परिणामों का वार झेलना होगा। जिससे पारिस्थितिक संतुलन का बिगड़ना तय है तथा जिसका एक दूरगामी परिणाम इसके दुष्परिणामों को लेकर है जिसमें वन्य जीवों के संरक्षण को लेकर एक खासी चिंता जताई जा रही है।
भारत में जीव जंतुओं की 91307 प्रजातियां पाई जाती है। यद्यपि भारत जैव विविधता के क्षेत्र में संसार के समृद्ध देशों में से एक है लेकिन वर्तमान में यह स्थिति हो चली है कि जनसंख्या वृद्धि, औद्योगिरण, पर्यावरण प्रदूषण के कारण इनकी संख्या तीव्र गति से घटती जा रही है। वन्य जीवों की इस सोचनीय स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस विषय पर सरकार की ओर से वन्यजीव संरक्षण व प्रबंधन की संकल्पना का आगमन हुआ तथा वन्यजीव अधिनियम-1972 द्वारा इसे कानूनी जामा पहनाया गया। जिसके तहत संकटग्रस्त जातियों के बचाव, शिकार पर प्रतिबंध, जीवों के व्यापार पर रोक व वन्यजीव आवास पर कानूनी संरक्षण जैसे मौलिक व गंभीर प्रश्नों को उठाया गया।
वन्यजीव संरक्षण एक व्यापक स्तर की परियोजना है जिसके तहत पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाए रखने की पहल पर अमल किया जाना है। यूनेस्को के मैन एंड बायोस्फीयर प्रोग्राम के तहत भारत सरकार ने वन्यजीवों के संरक्षण के लिए अनेक कदम उठाएं हैं, जिन्हें आमतौर पर चार भागों में पाट सकते हैं- प्रथम, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र। दूसरा, नेशनल पार्क। तीसरा, वन्यजीव अभ्यारण व चौथा, विलुप्त होती प्रजातियों के संरक्षण से संबंधित परियोजनाएं।
शुरूआती तीन परियोजनाओं में प्रायः जीवों की सुरक्षा को बनाए रखने, आवासों को क्षति पहुंचाना, इनके व्यवसाय पर प्रतिबंध आदि हर प्रकार की गैरकानूनी गतिविधि पर रोक है। इनमें जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र परियोजना जिनकी संख्या 18 है तथा इनमें से आठ को यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त है जिनमें नीलगिरी, सुंदरवन, मन्नार की खाड़ी, पंचमढ़ी, नंदादेवी, सिमलीपाल, नोकरेक, अचानकमार शामिल हैं। इन तीनों से परे चौथी परियोजना तेजी से विलुप्त होती जा रही प्रजाति से संबंधित है जो अब संकटापन्न परिस्थिितियों से गुजर रही है मसलन, बाघ, लाल पाण्डा, हंगुल प्रजाति का हिरण, घड़ियाल, कछुआ आदि जीवों की अनेक प्रजाति हैं जिनकी संख्या लगातार न्यूनतम होती जा रही है।
बहरहाल, इन संकटापन्न प्रजातियों के संरक्षण व उन्हें बनाए रखने के लिए सरकार द्वारा कई परियोजनाओं का जाल बुना गया जैसे हंगुल, यूरोपीयन रेण्डियर प्रजाति का हिरण है जो अब सिर्फ कश्मीर के डाचीग्राम राष्ट्रीय उद्यान में ही पाया जाता है। इसकी सुरक्षा व संख्या में वृद्धि हेतु वर्ष 1970 में हंगुल परियोजना शुरू की गई। इसी तरह वर्ष 1973 में बाघों के संरक्षण व रखरखाव हेतु प्रोजेक्ट टाइगर परियोजना का परिचालन किया गया। इसके अलावा घड़ियाल प्रजनन परियोजना संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के सहयोग से वर्ष 1975 में शुरू की गई तथा केवल भारत में पाए जाने वाले एक सींग वाले गैंडे के संरक्षण के प्रश्न पर 1987 गैंडा परियोजना का शुभारम्भ ओड़िशा के तिकड़ापारा से किया गया लेकिन कुछ समय बाद इसकी महत्ता व विस्तार को देखते हुए इसे उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, असम, महाराष्ट्र व अंड़मान आदि क्षेत्रों में भी अपनाया गया।
पारिस्थितिक संतुलन को बिगाड़ने में उर्जा का सीमित दायरे से बाहर आकर प्रयोग किया जाना एक महत्वपूर्ण कारण है जो वन्यजीवों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। दूसरा, उर्जा का उच्च दर्जे पर प्रयोग वैश्विक ताप जैसी समस्या के प्रति उत्तरदायी है। वैश्विक ताप विश्व स्तर पर उठने वाला एक बड़ा प्रश्न है तथा विश्व के सभी देश इसके नकारात्मक परिणामों से भलिभांति परिचित हैं। लिहाजा वैश्विक स्तर पर आयोजित होने वाले सम्मेलनों में वैश्विक ताप अक्सर केंद्र में रहा है ताकि संकटापन्न स्थिति के विषय पर विश्व के अन्य देशों का ध्यान खींचा जा सकें व सुधार की एक सकारात्मक भावना का उदय किया जा सके।
ख़ैर, देश में वन्यप्राणियों की स्थिति को देखते हुए जीव-जंतु कल्याण बोर्ड का गठन किया गया। जिसमें जीव-जंतुओ के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम-1960 के प्रावधानों को व्यवहार में लाने का कार्य सौंपा गया। इसी तरह बाघों को केंद्र में रखकर 2006 में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण अस्तित्व में आया। इसके साथ-साथ जैवविविधता, संकटापन्न प्रजाति, वन्यजीव नीति, वन्यजीव प्रबंधन आदि विषयों पर अध्ययन हेतु भारतीय वन्यजीव संस्थान की 1982 में नींव रखी गई जिसके अंतर्गत वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में प्रशिक्षण व अनुसंधान की मान्यता दी गई। इन सभी पहल का उद्देश्य पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखना है।
ऐसे में यह सवाल यह उठाया जा सकता है कि अगर हमारे पास प्राकृतिक संसाधन मसलन- जंगल, नदियां, झरने, खनिज सम्पदा  आदि ही नहीं बचेंगे तो कल हमारा किस पर आश्रित होगा? धीरे-धीरे वन्य सम्पदा का सिकुड़ना या संकुचित होना मानवीय प्रवृति पर एक तमाचा है तथा मानवीय प्रवृति का एक प्रतिकूल प्रभाव इन जंगली जानवरों पर पड़ रहा है। इसके जिम्मेदार अनियंत्रित होती मानवीय आकांक्षाएं हैं।
अतः स्पष्ट है कि बिगड़ते पारिस्थितिक संतुलन को सतत् व समावेशी बनाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अनियंत्रित होती आवश्यकताओं पर लगाम लगानी होगी। ऐसा केवल तभी हो सकता है जब लोगों के मध्य जागरूक अभियान का संचार होगा। तभी हम इस गंभीर व चिंतनीय विषय की तह में जाकर एक सकारात्मक उत्तर की खोज कर कर सकेंगें।